
धरती की गोद में
फिर एक कोंपल निकलना चाहता है
उसे नहीं मालूम कि कई घने पेड़
उसे धूप तक मयस्सर नहीं होने देंगे
जमीन की नमी को सोख लेंगे
मीलों तक जड़ों को फैलाकर
इलाके पर अपना वर्चस्व बताएंगे
फिर भी कोंपल जन्म लेना चाहता है
अपनी जमीन, अपना आसमान चाहता है
झाड़ और सूखे पत्तों के बीच कुछ बची नमी
और झुरमुटों के बीच से आती धूप से
एक दिन पेड़ बनने की ख्वाईश रखता है
कोंपल जो बड़ा होकर, लोगों को छांव देगा
जिस धरती से फूटा है, उसे टिकने का ठांव देगा
फलों-फूलों-सुगंध से जीवन का संचार देगा
परिदों को घोंसला और हमें जीवन का सार देगा।
टैग: राजीव कुमार, सीधी बात
जून 29, 2010 को 5:15 अपराह्न पर |
अच्छा है महाराज… कविताओं का भी शौक रखते हैं आप… वेरी गुड… प्रज्ञा कैसी है.. आशा करती हूं कि जूनियर प्रसाद भी ठीक होगा….
नवम्बर 16, 2009 को 7:56 अपराह्न पर |
बहुत खूब, वृक्षों के महत्व को समझाने में आप की कविता बहुत सक्षम है
नवम्बर 16, 2009 को 7:00 अपराह्न पर |
nice