आम दिनों की तरह मेरी नींद आज भी देर से खुली और हर रोज की तरह अधखुली पलकों से कमरे के बाहर पड़ा अख़बार उठाया और टीवी पर ज़ी न्यूज़ खोलकर निगाहें जमाने की कोशिश करने लगा। जैसे ही मेरी नज़र नीचे चल रही पट्टी पर गई तो मेरी आंखे खुली की खुली रह गई। एक युग पुरुष हमेशा के लिए मौन हो गए। प्रभाष जोशी जी नहीं रहे या यूं कहें कि एक युग का अंत हो गया। रहे। 72 साल की ही उम्र में उन्होंने दुनिया को अलविदा कह दिया। गुरुवार की रात भारत-ऑस्ट्रेलिया मैच के बाद करीब 11:30 बजे उन्होंने सीने में दर्द की शिकायत की। जिसके तुरंत बाद उन्हें अस्पताल ले जाया गया और वहां डॉक्टरों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया। हिन्दी भाषा और साहित्य के विकास में योगदान के लिए उनको साल 2007-08 का शलाका सम्मान दिया गया था। आज के पत्रकारों की फौज में मेरे जैसे जाने कितने होंगे जो उन्हें प्रेरणा के तौर पर मानते होंगे। पत्रकारिता की क…ख…ग… सीखने को दौरान इनके अग्रलेखों को नज़ीर की तरह पढ़ाया जाता था। हमारे बीच से उनका अचानक यूं चले जाना… एक पल को तो आंखों पर भरोसा ही नहीं हुआ। लेकिन सच कहें तो वो आज भी हमारे बीच हैं… उनकी लेखनी… उनकी अमर कृतियां हमेशा उनके साथ का एहसास दिलाती रहेगी।
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