ऊंची इमारतों के बीच,
अंतहीन सड़कों पर,
ना जाने किसे पीछे करने की होड़ में,
लोग भागते जा रहे हैं।
कंक्रीटों से बने
मजबूत इमारतों के बीच,
रिश्ते भी क्या मजबूत होते हैं ?
न जाने कितने बंधन छूटे,
न जाने कितने रिश्ते टूटे,
पर लोग भागते जा रहे हैं।
बड़े शहर का,
बड़े डगर का,
दिल भी बड़ा क्या होता है ?
न जाने कितने वादे झूठे,
न जाने किसने चैन लूटे,
पर लोग भागते जा रहे हैं।
बड़ा बनना है समय से पहले,
खुद की नजर में उठ भी नही सकते,
सीना फूलाए हैं
शर्म कहीं खो गया है !
न जाने किसका चमन उजड़ा,
न जाने किसका अमन बिखड़ा,
पर लोग भागते जा रहे हैं।
देख कर इन बेतरतीब हादसों को,
याद आता है गांव मेरा,
फिर होले से दिल पूछता है ये,
क्या यही है महानगर ?
टैग: कविता, महानगर, राजीव कुमार, सीधी बात
अक्टूबर 28, 2009 को 10:21 पूर्वाह्न पर |
हुज़ूर आपका भी एहतिराम करता चलूं…..
इधर से गुज़रा था, सोचा सलाम करता चलूं
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अक्टूबर 28, 2009 को 7:35 पूर्वाह्न पर |
आप का स्वागत करते हुए मैं बहुत ही गौरवान्वित हूँ कि आपने ब्लॉग जगत मेंपदार्पण किया है. आप ब्लॉग जगत को अपने सार्थक लेखन कार्य से आलोकित करेंगे. इसी आशा के साथ आपको बधाई.
ब्लॉग जगत में आपका स्वागत हैं,.
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अक्टूबर 28, 2009 को 5:54 पूर्वाह्न पर |
बहुत हीं प्रभावशाली रचना । स्वागत है ।
अक्टूबर 28, 2009 को 3:57 पूर्वाह्न पर |
बहुत अच्छा लेख है। ब्लाग जगत मैं स्वागतम्।
अक्टूबर 27, 2009 को 4:22 अपराह्न पर |
चिट्ठा जगत में आपका हार्दिक स्वागत है. लेखन के द्वारा बहुत कुछ सार्थक करें, मेरी शुभकामनाएं.
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दोस्ती पर उठे हैं कई सवाल- क्या आप किसी के दोस्त नहीं? पधारें- (FWB) [बहस] [उल्टा तीर]
अक्टूबर 27, 2009 को 2:50 अपराह्न पर |
Bahut Barhia…Aapka Swagat Hai… Isi Tarah Likhte Rahiye….
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