एक और शुरुआत

नवम्बर 16, 2009

small-plant
धरती की गोद में
फिर एक कोंपल निकलना चाहता है
उसे नहीं मालूम कि कई घने पेड़
उसे धूप तक मयस्सर नहीं होने देंगे
जमीन की नमी को सोख लेंगे
मीलों तक जड़ों को फैलाकर
इलाके पर अपना वर्चस्व बताएंगे

फिर भी कोंपल जन्म लेना चाहता है
अपनी जमीन, अपना आसमान चाहता है
झाड़ और सूखे पत्तों के बीच कुछ बची नमी
और झुरमुटों के बीच से आती धूप से
एक दिन पेड़ बनने की ख्वाईश रखता है

कोंपल जो बड़ा होकर, लोगों को छांव देगा
जिस धरती से फूटा है, उसे टिकने का ठांव देगा
फलों-फूलों-सुगंध से जीवन का संचार देगा
परिदों को घोंसला और हमें जीवन का सार देगा।

ऐ बाबू जरा संभल के…

नवम्बर 9, 2009

cardsतकनीक ने हमारी ज़िंदगी को बहुत आसान बना दिया है, लेकिन इसके दुरुपयोग ने मानो जीना मुहाल कर दिया है। अब उदाहरण तो ढेरों पड़े हैं, आपने भी इसे अक्सर महसूस किया होगा। अब कुछ दिनों पहले की ही बात है… मुझे पता चला कि किसी ने मेरे अजीज की क्रेडिट कार्ड से हजारों की हेराफेरी कर दी। अब बात यहीं तो ख़त्म होती नहीं। एक तो अचानक रुपए गायब हो जाएं तो बजट और सारी योजनाएं ही गड़बड़ हो जाती है उपर से बैंक इसके भुगतान का भी दबाव डालता है, यानी दोहरी मार झेलनी पड़ती है। फिर पुलिस… शिकायत.. दौड़धूप… मानसिक और शारीरिक परेशानी सो अलग। ख़ैर… मेरे हिसाब से किसी फ़र्ज़ीवाड़े से बचने का सबसे अच्छा तरीका है उसके तरीके को समझना और खामियों को जानना। तो लीजिए मैं आपको बताता हूं कि आप अपने क्रेडिट कार्ड कैसे हिफाजत से रखे ताकि कोई आपके इलेक्ट्रॉनिक पॉकेट में हाईटेक सेंधमारी न कर सके। इस फ़र्जीवाड़े का सबसे आसान तरीका है आपके पहचान की चोरी करने के बाद उसका इस्तेमाल। मसलन कार्ड धारक का नाम, अकाउंट नंबर, कार्ड की वैधता या ऐसी ही कुछ और जानकारी के जरिए फ़र्जीवाड़ा। इससे बचने के लिए न तो अपने कार्ड की जानकारी किसी को बताएं और न ही किसी ऐरेगैरे वेबसाइट पर इसे दें। क्रेडिट कार्ड फ़र्जीवाड़े का एक और तरीका है स्किमिंग। इसमें शातिर लोग खरीदारी के वक्त आपके कार्ड को स्वैप करते समय एक छोटे से इलेक्ट्रॉनिक उपकरण(स्किमर) में कार्ड के मैगनेटिक डैटा को चुरा लेता है। इसके बाद आपके कार्ड का हमशक्ल तैयार किया जाता है और फिर आप तो समझ ही रहे होंगे। इस धोखाधडी़ से बचने के लिए हमेशा प्रमाणित दुकानों से ही खरीदारी करें और अपने सामने ही कार्ड स्वैप कराएं। और कभी भी थोड़ी सी भी हेरफेर या संदेह होने पर बैंक और पुलिस को जरूर बताएं। यानी कुल मिलाकर यही है कि साहब सावधानी गई और दुर्घटना हुई इसलिए तो कह रहा हूं कि क्रेडिट कार्ड का इस्तेमाल तो जमकर करें लेकिन बाबू जरा संभल के।

और एक युग का अंत हो गया…

नवम्बर 6, 2009

prabhash-joshiआम दिनों की तरह मेरी नींद आज भी देर से खुली और हर रोज की तरह अधखुली पलकों से कमरे के बाहर पड़ा अख़बार उठाया और टीवी पर ज़ी न्यूज़ खोलकर निगाहें जमाने की कोशिश करने लगा। जैसे ही मेरी नज़र नीचे चल रही पट्टी पर गई तो मेरी आंखे खुली की खुली रह गई। एक युग पुरुष हमेशा के लिए मौन हो गए। प्रभाष जोशी जी नहीं रहे या यूं कहें कि एक युग का अंत हो गया। रहे। 72 साल की ही उम्र में उन्होंने दुनिया को अलविदा कह दिया। गुरुवार की रात भारत-ऑस्ट्रेलिया मैच के बाद करीब 11:30 बजे उन्होंने सीने में दर्द की शिकायत की। जिसके तुरंत बाद उन्हें अस्पताल ले जाया गया और वहां डॉक्टरों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया। हिन्दी भाषा और साहित्य के विकास में योगदान के लिए उनको साल 2007-08 का शलाका सम्मान दिया गया था। आज के पत्रकारों की फौज में मेरे जैसे जाने कितने होंगे जो उन्हें प्रेरणा के तौर पर मानते होंगे। पत्रकारिता की क…ख…ग… सीखने को दौरान इनके अग्रलेखों को नज़ीर की तरह पढ़ाया जाता था। हमारे बीच से उनका अचानक यूं चले जाना… एक पल को तो आंखों पर भरोसा ही नहीं हुआ। लेकिन सच कहें तो वो आज भी हमारे बीच हैं… उनकी लेखनी… उनकी अमर कृतियां हमेशा उनके साथ का एहसास दिलाती रहेगी।

क्या यही है महानगर ?

अक्टूबर 26, 2009

ऊंची इमारतों के बीच,
अंतहीन सड़कों पर,
ना जाने किसे पीछे करने की होड़ में,
लोग भागते जा रहे हैं।
कंक्रीटों से बने
मजबूत इमारतों के बीच,
रिश्ते भी क्या मजबूत होते हैं ?
न जाने कितने बंधन छूटे,
न जाने कितने रिश्ते टूटे,
पर लोग भागते जा रहे हैं।
बड़े शहर का,
बड़े डगर का,
दिल भी बड़ा क्या होता है ?
न जाने कितने वादे झूठे,
न जाने किसने चैन लूटे,
पर लोग भागते जा रहे हैं।
बड़ा बनना है समय से पहले,
खुद की नजर में उठ भी नही सकते,
सीना फूलाए हैं
शर्म कहीं खो गया है !
न जाने किसका चमन उजड़ा,
न जाने किसका अमन बिखड़ा,
पर लोग भागते जा रहे हैं।
देख कर इन बेतरतीब हादसों को,
याद आता है गांव मेरा,
फिर होले से दिल पूछता है ये,
क्या यही है महानगर ?

कभी तो पहल करनी ही पड़ती

अक्टूबर 19, 2009

जाने कब से ये कसमसाहट सी थी… लेकिन येनकेन वजहों से भड़ास दिल में ही दबी रह जाती थी… और फिर जिंदगी का सफर यूं ही चलता रहा… लेकिन गुबार निकालने की ये पहल तो कभी न कभी करनी ही थी… सो कर दी… सीधी बात करने ही जुर्रत हमेशा से रही है जो अब मेरी आदत में शुमार है… इसलिए इस मंच का नाम भी वही रख दिया… सीधी बात…. हां ये और बात है कि सच का स्वाद थोड़ा कड़वा जरूर होता है…. लेकिन क्या करूं… खैर मुझे तो इसकी आदत है… अब आप लोग भी इसकी आदत बना ले तो आपको भी आनंद आएगा और जिन आदरणीय लोगों को इससे तकलीफ है वो भी अपनी भड़ास निकालने के लिए आजाद हैं… आखिरकार हम आजाद देश के नागरिक जो हैं…


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